Friday, January 3, 2014

दिल्ली ,मीडिया और राष्ट्रीय राजनैतिक परिवेश

पिछला एक महीना राजनैतिक सरगर्मियों से भरपूर रहा । चार राज्यों में चुनाव हुए। तीन में बीजेपी भारी बहुमत से विजयी हुई, राष्ट्रीय राजधानी में आम आदमी पार्टी (आप ) ने इतिहास रचते हुए सरकार बनायी । पहली कोशिश में IIT , U.P.S.C. और मुख्यमंत्री की कुर्सी निकलने वाले केजरीवाल साहिब है तो किस्मत के धनी । 
चुनाव से पहले जिस पार्टी को केजरीवाल जी ने घूँट पी पी कर कोसा ,आज आधिकारिक  या अनाधिकारिक रूप से उन्हीं के समर्थन से सत्ता में बैठने का मौका मिला  ।थूक के चाट ही लिया चाहे कुछ भी हो, रेफेरेंडम की मरीचिका हो या सत्ता का मोह या जनता की सेवा करने की जल्दीबाजी या इच्छा। राजनीती भी बड़ी अजीब चीज है , खुद को ईमानदार साबित करने के लिए जो बातें , आश्वासन और वादे किये गए  ,कही न कही जाने अनजाने में समझौता हो ही गया । इस राजनीती में जुबान की कोई कीमत ही नहीं हैं , जिनसे थोड़ी बहुत उम्मीद थी वह भी दगा दे गए । मुन्नवर राणा की कुछ पंक्तियाँ एक दम सटीक बैठती है -
" यह जो काँधे पर खुद्दारी का मैला सा अँगोछा है 
अगर हम भी "आप" की तरह बेच देते , तो न जाने कितनी कारें आ जाती । "

आशा है कि आप पूरी ईमानदारी से 5 साल जनता की सेवा करे, खुद को साबित करे, वादों को जमीनी अमली जमा पहनाये और उनके नतीजे आएं  क्योंकि अभी तक उन्होंने बातें ही की है ,खुदी ने खुद को ईमानदार घोषित किया हुआ है ,अब वक़्त भी है ,मौका भी और जरुरत भी । अगर ऐसा सम्भव हो पाया तो "आप " निश्चित तौर पर भारत के राजनैतिक भविष्य के स्वर्णिम युग की शुरुवात करेगी । 

आज जब "आप " नयी नयी सत्ता में आयी है ,उन्हें काम करने के लिए वक़्त  दिया जाना चाहिए, अभी से उन्हें सही गलत के तराजू में नहीं तौलना चाहिए। परन्तु कुछ दिनों से  "main stream" मीडिया ने अचानक "आप" को लाइमलाइट में लेना शुरू किया है ,थोड़ी आशंका उठती है । किसी भी राष्ट्रीय  न्यूज़ चेनल की वेबसाइट खोल लीजिये, अनुमानत 5 -10 खबरें सिर्फ आप की ही हैं । केजरीवाल साहिब की खांसी तक राष्ट्रीय खबर बन गयी और आंध्र प्रदेश में दस दिन पहले हुए भीषण हादसे में गयी 26 जानें, सौ स्पीड न्यूज़ में सिर्फ एक न्यूज़ बन न जाने कहा खो गयी । भारत में 27  अन्य राज्य हैं , कुछ दिल्ली से काफी बड़े भी है । इतने बड़े देश में राष्ट्रीय खबरों  का इतना अकाल पड़ जाये कि एक दल की हर हरकत को राष्ट्रिय स्तर पर दिखाया जाये ,सम्भव नहीं है । दुसरे राज्य तो छोड़िये तीन अन्य राज्यों में भी कैबिनेट घठन हुआ है ,यहाँ भी मंत्री नामक पद होता है जिस पर दिल्ली की ही तरह कुछ विधायक आसीन होते है । किसी ने नाम भी सुना छत्तीसगढ़ में कौन कौन मंत्री बना ?मीडिया तट्ठस्त है तो सबकी बात होनी चाहिए । परन्तु  दिल्ली में बनाये गए हर मंत्री के बारे में कितनी न्यूज़ चलायी गयी टीवी पर.स्पष्ट रूप से सामने है ।  वसुंधरा  राजे जी ने पूर्व राज्यपाल कमला जी द्वारा हड़पी गयी जमीन को दो हफ्ते के भीतर तुरंत सरकारी कब्जे में लिया ,रोबर्ट वाड्रा पर जांच आयोग बिठाया गया,मप्र में भी शिवराज सिंह जी ने शपथ लेते ही  1 रूपया प्रति किलो चावल गरीबो को देना शुरू किया , एक खबर तो बनती थी main stream मीडिया में ,आखिर यह तीनो राज्य भी भारत में ही है , चुनाव यहाँ भी हुए हैं ।गोवा मुख्यमंत्री परिकर जी हो या त्रिपुरा के माणिक सरकार जी ,सादगी के जीवन का पर्याय है । फिर केजरीवाल जी पर इतनी मेहरबानी क्यों ? शायद त्रिपुरा और गोवा मीडिया के हिसाब से भारत के अंग नहीं है ।  केजरीवाल साहिब को हुए दस्त तक राष्ट्रिय खबर बन गए, बेचारे हजारों बच्चे जो हर रोज दस्त,बिमारी या भूख से मरते है ,आज तक राष्ट्रिय खबर का हिस्सा नहीं बने । अब इन् बेचारो की गरीबी के लिए कहाँ  से स्पांसर लाएं । 

अपवाद यह है कि भारत में पेड  न्यूज़ का सिलसिला कुछ नया नहीं है । अधिकतर न्यूज़ चेनल्स किसी न किसी राजनेता से सीधे या पारिवारिक तौर पे सम्बन्ध रखते है । खबरें बनायीं और बिगाड़ी अपने हिसाब से जाती है । अब आप पर अचानक इतना प्यार उमड़ना टीवी चैंनलों का ,वह भी बिना किसी मतलब के, शायद ही मुमकिन है । 

सीधे तौर पे दिख रहा है कि राहुल गांधी अगर प्रधानमंत्री पद के लिए खड़े भी हो गए तो शायद ही कुछ करिश्मा कर पाये । नरेंद्र मोदी की लहर ने कांग्रेस का तो सूपड़ा लगभग साफ़ कर ही दिया है । फिर अब कांग्रेस और मीडिया के पास विकल्प क्या है ? वही विकल्प जो ज्यादा पुराना नहीं है- प्रजा राज्यम ,एनसीपी या आप ,कांग्रेस को कहाँ फर्क पड़ता है । बस "आप" बाकी दो से इसलिए अलग है क्योंकि यह  एक पार्टी नहीं अपितु अनगिनत ईमानदार  कार्यकर्ताओं की विचारधारा की लड़ाई है जिसका इस्तमाल कांग्रेस ने दिल्ली में तो कर लिया है, राष्ट्रिय राजनीती में शायद हो जाये । 

कांग्रेस को पता है मोदी को रोक पाना उनके बस की नहीं है । अगर केजरीवाल साहिब दिल्ली में पूर्ण बहुमत से आते तो जरूर वह 2g , कमोन्वेल्थ भ्रष्ठाचार पर खुले रूप से कार्यवाही करते या कोशिश तो करते । अब जब कांग्रेस सत्ता के अंदर है तो वह जैसे चाहे जितना चाहे इन मुद्दों को लम्बा खीच सकती है ,समर्थन  वापिस लेना तो उनका अधिकार है ही । लोकसभा चुनाव तक यदि ये मुद्दे दबे रहे तो कांग्रेस की काफी समस्या हल है । और रही बात मीडिया की तो आने वाले समय में केजरीवाल बनाम मोदी का प्रोपेगंडा खड़ा करवा के बाकी मुद्दों को दबाया जा सकता है । आप के लोकसभा मिशन के लिए कर्मठ कार्यकर्ताओं कि फ़ौज सोशल मीडिया और जमीन पर  पर दिन रात काम करेगी , बाकी मीडिया में पूरे गाजे बाजे के साथ "आप" को आने वाले 4 -5 महीने जम के दिखलाया जायेगा जैसा की शुरुवात हो चुकी है । मीडिया और सोशल मीडिया शहरी सीटों पर काफी प्रभाव डालेंगे । "आप" भी चूंकि उनका केडर हर गाँव देहात में नहीं है ,तो लोकसभा की 300 शहरी सीटों पर ध्यान केंद्रित करेगी,जहाँ पढ़े लिखे लोगो कि संख्या ज्यादा है ।  अब जमीनी तौर पर यह तो सम्भव है नहीं कि "आप" 272 का आंकड़ा छू ले , एंटी कांग्रेस वोट बटेंगे शहरों में जैसा कि दिल्ली में हुआ । और अगर बीजेपी 200 या 220 के आसपास भी पहुच के अटक गयी तो वही होगा जो दिल्ली में हुआ , बहुमत के पास पहुच कर भी बीजेपी सरकार नहीं बना पायेगी और जोड़ तोड़ के UPA3  की प्रबल सम्भावना होगी क्योंकि यह चुनाव मोदी बनाम "रेस्ट ऑफ़ आल " है । आप को पूरी कोशिश करनी चाहिए की वह कांग्रेस की इस रणनीति का हिस्सा न बने, राष्टीय राजनीती में "आप" को जरूर आना चाहिए परन्तु एक नींव तैयार कर । दिल्ली में जबर्दस्त काम करे, सरकार गिरती भी है तब भी अपने ईमान धर्म से समझौता न करे ,जब जनता साथ है तो डर काहे का । आप यदि कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार बना सकती है तो क्यों न राष्ट्रिय स्तर पर बीजेपी के साथ मिल कर चुनाव लड़े । कम से कम कांग्रेस का तो सफाया हो जायेगा । बाकी रही बात आगे कि तो राजनीती में कुछ भी तट्ठस्त नहीं होता । पांच साल में नींव भी तैयार हो जायेगी और लड़ने के लिए एक पार्टी कम भी  । परन्तु जिस हिसाब से मीडिया और कांग्रेस का खेल आगे बढ़  रहा है यह नामुमकिन ही है । 
इतना तो तय है "आप" को बेशुमार मीडिया कवरेज मिलने वाला है लोकसभा चुनाव तक जिसका आगाज हो चुका है । आने वाले समय में प्रबल सम्भावना है मीडिया द्वारा केजरीवाल को प्रधानमंत्री पद के समकक्ष दिखलाना । हो सकता है बीजेपी के सरकार न बनाने कि स्थिति में वह प्रधानमंत्री बन भी जाये क्योंकि थर्ड फ्रंट को भी एक ईमानदार छवि वाला नेता चाहिए, 20 -25 सीटें भी यदि "आप" की आ गयी ,तो यह समीकरण बनते देर नहीं लगेगी । वैसे  भी  थर्ड फ्रंट के आप से रिश्ते काफी मधुर है, कई  आप नेता माओवाद ,कश्मीर की आजादी और कम्युनिस्ट विचारधारा की ही उपज है । 

निश्चित तौर पर आने वाले 5 महीने भारत का भविष्य तय करेंगे । आप को तुरुप का इक्का बनने की  कोशिश करनी चाहिए न कि वह प्यादा जिसे वजीर की रक्षा में जरुरत और समय के हिसाब से शहीद किया जा सके । और जनता को बेगानी शादी में अब्दुल्ला बन तमाशा ना देखते हुए अपने विवेक से काम लेना चाहिए 
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कुलदीप 

Friday, April 5, 2013

जो नहीं जानता 5 रूपये की कीमत

जो नहीं जानता 5 रूपये की कीमत
वो मेरे देश के सिंहासन पे बैठने का हक नहीं रखता
कीचड़ से होता हुआ वो 2 किलोमीटर चल के
बस स्टॉप पे पहुँचता है
पसीने से लदफद
जेब में हाथ डालता है ..मुस्कुराता है ..5 रूपये बचा लिए|
AC की बस में 25 रूपये किराया है
15 मिनट खड़ा रहता है, दूसरी बस में 20 रूपये किराया है
देर से ऑफिस पहुँचता है ,
बॉस डांटता है .. वो जेब पे हाथ रख के मुस्क्रुरता है .. 5 रूपये बचा लिए |
दोपहर को एक रोटी कम खता है ,
पेट पे हाथ रख के मुस्कुराता है – 5 रूपये बचा लिए |
दोस्त की खुशामद करता है .. और (2.50 ) ढाई रूपये बचा लिए |
शाम की चाय के और बच गए,
17.50- साढे सत्तरहा रूपये बचाए हैं आज उसने 
आज वो वादा निभाएगा …शाम को लेके जाएगा मुन्ने की मिठाई ..
आम आदमी को इतने करीब से जो नहीं जनता,
जो नहीं जानता 5 रूपये की कीमत
वो मेरे देश के सिंहासन पे बैठने का हक नहीं रखता |

Thursday, February 28, 2013

90 का दूरदर्शन और हम

90 का दूरदर्शन और हम -
1.सन्डे को सुबह-2 नहा-धो कर टीवी के सामने बैठ जाना 
2."रंगोली" में शुरू में पुराने फिर नए गानों का इंतज़ार करना 
3."जंगल-बुक" देखने के लिए जिन दोस्तों के पास टीवी नहीं था उनका घर पर आना 
4."चंद्रकांता" की कास्टिंग से ले कर अंत तक देखना 
5.हर बार सस्पेंस बना कर छोड़ना चंद्रकांता में और हमारा अगले हफ्ते तक सोचना 
6.शनिवार और रविवार की शाम को फिल्मों का इंतजार करना 
7.किसी नेता के मरने पर कोई सीरियल ना आए तो उस नेता को और गालियाँ देना 
8.सचिन के आउट होते ही टीवी बंद कर के खुद बैट-बॉल ले कर खेलने निकल जाना 
9."मूक-बधिर" समाचार में टीवी एंकर के इशारों की नक़ल करना 
10.कभी हवा से ऐन्टेना घूम जाये तो छत पर जा कर ठीक करना :)
(copied)

समय और बदलाव

माँ बनाती थी रोटी 
पहली गाय की 
आखरी कुत्ते की 
एक बामणी दादी की 
एक मेहतरानी बाई की |
.........

हरसुबह
सांड  जाता 
दरवाज़े पर,
गुड की डली के लिए |
कबूतर का चुग्गा 
कीड़ीयों का आटा
ग्यारस,अमाव,
पूनम का सीधा 
डाकौत का तेल,
काली कुतिया के ब्याने पर
तेल गुड का हलवा
सब कुछ निकल आता था
उस घर से
जिस में विलासिता के नाम पर
एक टेबल पंखा था |
आज सामान से भरे घर से
कुछ भी नहीं निकलता
सिवाय कर्कश आवाजों  के ................................

(copied)

Friday, February 22, 2013

Bomb Blasts in India- my first reaction

क्या लिखूं ?
किस पर लिखूं ?
कैसे अपनी सवेदनाएं लिखूं?
चीखते लोगो पर लिखूं?
या बिखरी लाशों पर लिखूं?
दरिंदो की हैवानियत पर लिखूं?
या प्रशासन की नाकामी पर लिखूं?
मुआवजे में दिए कागजों के टुकडो पर लिखूं?
या बिलखती माँ के आंसुओ पर लिखूं?
कैसे अपनी वेदनाएं लिखूं..........-..???
(copied)

Thursday, January 10, 2013

सामाजिक स्थिति और बदलाव

पिछले एक दशक में भारत ने कई परिवर्तन देखे है । कई मुद्दे आये .. राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, अन्ना  आन्दोलन, रेप , टेलिकॉम घोटाला , कोयला आदि आदि । पर इन् सब मुद्दों में एक मुद्दा पीछे कही छूट गया ... सामाजिक सरोकार और बदलाव का । 2001 के शुरुआत से भारत में आईटी ने अपनी पकड़ बनायीं , बहुराष्ट्रीय  कंपनियों ने भारत को सीधा निशाना बनाया .. हर तरफ  MBA , इंजिनियर स्नातको की भीड़ नजर आने लगी । लोगो की आय बढ़ी और छोटे शहरों से महानगरो में होने वाले पलायन में भारी वृद्धी हुई । बदलती जीवन शैली और सोच में ये समाज इतना आगे निकल गया की उन्हें ये याद ही नहीं रहा की भारत मात्र 13 करोड़ इन्टरनेट से जुड़े भारतीयों और कुछ सूडो सेक्युलर बुद्धिजीवी मानसिकता वाले लोगो का नहीं है।

बदलाव की हवा हर तरफ बही। बड़े शहरों में  मॉडर्न बनने की होड सी लग गयी। आप ABC कंपनी में काम करने वाले  शर्मा जी को ले या अन्य किसी जगह काम करने वाली मिस चोपडा को .. नाम बदल गए है, महानगर अलग होगा पर जीवन और विचार लगभग सामान है । ज्यादा सैलरी वाली नौकरी,जुबान पे फर्राटेदार इंग्लिश, हाथ में ऊँगली  से टक  टक करने के लिए आईफोन  और किसी भी मुद्दे पर कैंडल मार्च करने में सबसे आगे। बात करो तो ऐसा  लगता है मानो ओबामा साहिब के रिश्तेदार हो । जुबान पे कृत्रिम मुस्कराहट के कारण  कुछ साल बाद ये पता करना मुश्किल है की वो सिर्फ मुस्कराहट मात्र है या शकल ही वैसी है । मीडिया जो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाया करता था वो भी ऐसे ही कुछ लोगो की जागीर बन गयी । कोई इनके खिलाफ बोल के तो दिखाए, बोलचाल और  दलील में आप इनसे जीत नहीं सकते । 

और हां,बस बातचीत में ही आप इनसे जीत नहीं सकते क्योकि हकीकत में इन् लोगो का कोई अस्तित्व नहीं है 


पहली बात तो ये की इनमे से अधिकांश तो वो लोग है जो दुसरे शहरो से आये है और यदि उसी शहर से है तो भी वोट नहीं डालते तो इनका इस देश में सामाजिक अस्तित्व तो यही ख़तम हो जाता है । ताजा तरीन रेप का मुद्दा ही ले लीजिये- आप इनसे कैंडल मार्च निकलवा लो, निंदा करवा लो , tweet  करवा लो , गुस्सा करवा लो पर इन्ही के भाई बन्धुओ से जिंदगी मौत के बीच संघर्श करती आधी रात सड़क पे पड़ी लड़की को अस्पताल पहुचवाने की बात न कीजिये । दूसरी और सिस्टम के खिलाफ जम के न्यूज़ चेनल्स में बुलवा लो पर कोई इनसे ये कहे की अपनी आने वाली नस्ल को अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा में अच्छे नंबर ला के पुलिस कांस्टेबल, सिपाही, या आईएस  बन और छोटे कस्बो और गावो में काम करने के लिए प्रोत्साहित करो तो वो भी नहीं होगा । न तो ये लोग "लो-क्लास"  जिंदगी नहीं जी सकते और ना ही उन् लोगो की जिंदगी,विचारधारा जो इनके हिसाब से " ऑर्थोडॉक्स " है, उसे  उन्ही लोगो के बीच जा के बदलने की कवायद कर सकते ।छड़ी घुमा के बस आदेश कर देते है दिल्ली बम्बई के चकाचौंध गलियारो से कि समाज बदल दो, चोर पकड़ो , डिस्को-पब में हमे सुरक्षा दो, जमीनी स्तर  पे कार्य करने वाले लोगो को बोलने मत दो , पर इनसे कुछ मत कहो ।जो मुद्दा इनके काम का नहीं है उसपर दूर दूर तक कोई सियार नहीं रोता है चाहे वो किसान आत्महत्या का मामला हो या भुकमरी का। फा--फु जिंदगी ही चाहिए इन्हें बस । कभी कभी सोच में पड जाता हूँ  कि इन् लोगो के लिए शहीद हेमराज और सुधाकर का मस्तक कलम करवाना कहा तक जायज है ?

इस  पूरे  सामाजिक  बदलाव  में  भारतीयता  कही खो सी गयी है । समाज को समय के साथ बदलना चाहिए । पुराने  रीति  रिवाज  भी  बदलने  चाहिए।  पर बदलाव  एक  केमिकल  रिएक्शन  नहीं  है  की  H2So4  में  पानी  मिलाओ  और  हो  गया । परिवर्तन एक  प्रक्रिया  है । न जाने  कितने  नीव  के पत्थरो ने  अमेरिका  और  इंग्लैंड  की  औद्योगिक  क्रांति  में अपनी जिंदगी लगा  दी  होगी  जिसके  परिणाम  स्वरुप  आज उनके पोते पडपोते  भोतिक  वाद का  लुत्फ़  उठा  रहे है ।  व्यक्ति  बदलता तब  है जब कुछ फायदा दिखता है, भारत के अधिकांश भाग में आज भी शिक्षा, महिला उत्थान, शराब, पाकिस्तान, भ्रष्टाचार  मुद्दे नहीं है, दो वक़्त  की  रोटी  नसीब  हो  जाये साहिब, काफी है ! 

भारत के इस मॉडर्न समाज को ये नहीं भूलना चाहिए की उनके पुरखे कुछ नहीं कर के गए है और बदलाव चाहिए तो खड़े हो, गाँव गाँव, गली गली घूमे, देश की बुनयादी समस्याए जैसे भुकमरी, आतंकवाद ,भ्रष्टाचार  के खिलाफ आवाज उठाने के साथ साथ लड़े, संघर्ष करे और नीव के पत्थर बने जिस पर नए समाज का ढांचा खड़ा हो, सामान विकास हो और भारत का एक तबका जो आज भी सिर्फ मदद की आस में उम्मीद बंधे खड़ा है उसकी जिंदगी में कुछ बदलाव आये, उसका कुछ भला हो| फलस्वरूप आप की आने वाली मॉडर्न नस्ल वो सब खुले आम कर पाए  जिसके समर्थन में आज आप पुरजोर  आवाज उठा रहे है नहीं तो फिर कही किसी राज्य में अपनों से लड़ते हुए जवान शहीद होंगे, मुवावजो को ऐलान होगा, दो चार दिन की खबर आएगी और फिर हम आमिर और सलमान  की आने वाली फिल्म का इन्तजार में जुट जायेंगे और और शाम होते ही नए किसी आन्दोलन की तलाश में मोमबत्तिया ले के सडको पर " इवनिंग वाक " के लिए निकल जायेंगे ।

कुलदीप 

Friday, January 4, 2013

सामाजिक अनभिज्ञता और अपराध


दिल्ली में आखिर कार 2012 में 600+ बलात्कार की घटनाओ के बाद  देश जाग ही गया।बधाई ! संसद से लेकर सड़क तक ,ट्विटर से फेसबुक तक आवाज उठाना लगी इस घिनोने कृत्य के खिलाफ। कल तक आशंका है कुछ महिला संगठन और आ जायेंगे मैदान में आवाज उठाने। टीवी चेनल भी सनसनी खबरे दिखा रहे है । पर क्या इस से  सच  में समस्या का कुछ हल  होगा या फिर वही पुराना हिंदी मुहावरा चरितार्थ होगा  " थोथा चना बाजे घणा  "|

संसद में  यह मुद्दा भी उठा, कुछ महिला सांसदो ने आवाज बुलंद की , कुछ की अश्रु धरा भी बह निकली , पर कभी कभी इन् आंसुओ और मंसूबो पर शक होता है। न जाने रोज कितनी घटनाये आम तौर पर दिल्ली में होती है और अनेको सामने भी नहीं आती ,तब कहा चले जाते है सांसद  और राज्य की महिला मुख्यमत्री जिन्हें 600 रुपये में घर चलने की नसीहत देने क अलावा कुछ नहीं आता। सौ में से एक कार्यवाही हो भी जाती है तो उसमे भी सेहरा अपने सर बाँधने की कवायद शुरू हो जाती है । फिर खड़े हो उठते है महिला मोर्चा और संगठन अपनी पीठ थपथपाने । दूसरी ओर टीवी चेनल्स को एक मुद्दा मिल गया गुजरात मत गणना  से पहले। अब दो तीन दिन जम  के विरोध के स्वर उठाएंगे और अचानक न्यूज़ गायब हो जाएगी जैसे ही गुजरात मतगणना के परिणाम सामने आने लगेंगे ।शर्म की बात है इतना जघन्य अपराध सिर्फ मुद्दा बन के फिर  किन्ही प्राथमिकताओ में खो जायेगा।
अब जरा बात कर ले इस देश  के  जागरुक  पढ़े लिखे युवा की । अचानक ट्विटर फेसबुक पे इस अपराध के  खिलाफ प्रतिक्रियाओ की बाढ़ सी आ गयी है । कोई फोटो शेयर कर रहा है तो कोई अपने स्टेटस में इसका पुरजोर विरोध कर रहा है । देख के अच्छा  लगा  की युवा जागरूक है सामाजिक अपराधियों  के खिलाफ।पर इनमे से काफी वो है जिन्हें इस खबर की जानकारी भी सिर्फ फेसबुक या ट्विटर से ही मिली है । अब इन्हें स्टेटस अपडेट करने से फुर्सत मिले तो पता भी करे न की देश में क्या चल रहा है। घूमती  फिरती खबर सोशल मीडिया में आ गयी तो इतना बवंडर भी हो गया नहीं तो कितने बलात्कार  रोज होते है शायद की कोई मामला इतना तूल पकड़ता है । पते की बात तो ये है की इस खबर का हाल भी वैसा ही हो गया है जैसे कुछ दिन पहले हर कोई 12.12.2012 का स्टेटस अपडेट कर रहा था। कोई ना, दो तीन दिन की बात है फिर क्रिसमस इन्तजार कर रहा है फिर न्यू इयर , नया स्टेटस अपडेट करने की चाह फिर इस घटना पर  जल्द ही पर्दा दाल देगी । दुआ है इश्वर से की काश दो तीन दिन में कोई कद कदम उठ जाये नहीं तो फिर एक नए हादसे तक इन्तजार करना पड़ेगा न्याय के लिए ।
कुल मिला के मुद्दा अपराधिक होने के साथ साथ सामाजिक भी है । अपराधियों के खिलाफ दो तीन दिन हल्ला होता है फिर वही ढाक  के तीन पात। सामाजिक अनिभिज्ञता के माहौल में जरूरी है कि अपराधियों  को  तब तक न छोड़ा जाये जब तक की कुछ निष्कर्ष न निकले नहीं तो अपराधियों के हौसले बुलंद होते जायेंगे और ऐसे अमानवीय कृत्य  अन्ना आन्दोलन की तरह नयी चटपटी खबरों  के बीच कही इतहास बन गुम हो जायेंगे ।